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Wednesday, September 27, 2017

नवरात्रा विशेष : कन्या पूजन और इसका वैदिक महत्व, कौनसा दिन श्रेष्ठ है कन्या पूजन के लिए ?

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नवरात्रा विशेष : कन्या पूजन और इसका वैदिक महत्व
नवरात्रा के पवित्र नौ दिनों में सप्‍तमी तिथि से ही कन्‍या पूजन का दौर प्रारम्भ हो जाता है, और इस पूरे प्रक्रम में छोटी छोटी कन्‍याओं को घर निमंत्रित किया जाता है,उनको दैवीय अवतार मानकर खूब मान सम्मान किया जाता है।  दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन इन नौ कन्याओं को नौ देवियों का प्रतिरूप मानकर घर बुलाकर इनका स्वागत किया जाता है, चरण वंदना की जाती है, नौ देवियों की तरह ही आदर सत्कार और स्वादिष्ट पकाएं युक्त भोजन कराने से लेकर भेंट चढाने तक सारे कार्य किये जाते है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होकर अपने साधकों को सुख समृद्धि और दीर्घायु का वरदान देती हैं।


कौनसा दिन श्रेष्ठ है कन्या पूजन के लिए ?

प्रायः समय की उपलब्धता के अनुसार लोग सप्तमी से ही कन्या पूजन प्रारम्भ कर देते है।  किन्तु शास्त्रों के अनुसार अष्टमी तिथि को की गई कन्या पूजा सर्वाधिक फलदायी होती है।

कन्या पूजन की विधि
  • कन्या पूजन के एक दिन पूर्व ही कन्याओं को अगराहपूर्वक निमंत्रण देना चाहिए 
  • बिना तैयारी के  इधर-उधर से कन्याओं को पकड़  पकड़ के लाना सही नहीं होता है, पूरे सम्मान के साथ पूर्व तैयारी से कन्याओं को निमंत्रण देकर ही कन्या भोजन और पूजा करनी चाहिए 
  • घर आई कन्याओं का आत्मीयता से स्वागत करें और पूर्ण मान सम्मान से आतित्थ्य करें। घर आई इन नौ कन्याओं को आरामदायक और स्वच्छ आसान पर बिठाकर इनके चरणों को कच्चे दूध से भरे चौड़े पात्र में क्रमानुसार रखकर अपने हाथों से इन कन्याओं के चरण प्रक्षालन करना  चाहिए और स्वच्छ पानी से धोकर चरण छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए।
  • तत्पश्चात कन्याओं के मस्तक पर अक्षत, पुष्प और कुंकुम का टीका लगाना चाहिए।
  • फिर माँ दुर्गा का स्मरण करके माँ का जयकार करें और इन नौ देवी रूपी कन्याओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वादिष्ट भोजन भरपेट कराएं।
  • भोजन समाप्ति के पश्चात सभी नौ कन्याओं को सामर्थ्‍य के अनुसार भेंट व दक्षिणा अथवा उपहार दें और पुनः चरण छूकर इनका आशीर्वाद लें।
  • अंत में सभी कन्याओं को आदर के साथ घर तक छोड़कर आएं। 
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कन्या पूजन के लिए कितने आयु की कन्या को करे निमंत्रित ?
कन्याओं की आयु दो वर्ष से कम तथा 9 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए तथा  संख्या कम से कम 9 तो होनी ही चाहिए और एक बालक भी होना चाहिए जिसे भैरव या हनुमान जी का रूप माना जाता है। जिस प्रकार बिना भैरव के माँ की पूजा पूर्ण नहीं होती, उसी प्रकार कन्या-पूजन भी बिना बालक के अपूर्ण होती है।

Monday, September 25, 2017

पंचम नवरात्रा : माँ दुर्गा के ममतामयी रूप स्कन्द माता की आराधना करने से होगी सुयोग्य संतान की प्राप्ति

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नवरात्र के पांचवे दिन अर्थात पंचमी को माँ दुर्गा के पांचवे स्वरुप भगवान स्कन्द (कार्तिक) की माता अर्थात "माँ स्कंदमाता" की आराधना की जाती है। भगवान् कार्तिकेय को ही "भगवान स्कन्द" के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिकेय देवताओं के सेनापति भी है, अतः जब भी विपत्ति आती है समस्त देवता भी स्कन्द माता की पूजा करके शत्रुनाश करने के लिए स्कन्द माता और कार्तिक की आराधना करते है।  

स्कंदमाता का स्वरूप

स्कन्द माता का सुंदर रूप अलौकिक है, माँ स्कंदमाता कमल के पुष्प पर  अभय मुद्रा में विराजमान होती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्कंदमाता राजा हिमालय की पुत्री माँ पार्वती ही हैं, जिन्हें हम माहेश्वरी और गौरी के नाम से भी सम्बोधित कर सकते है। माँ स्कंदमाता चार भुजा धारी हैं जिनमें से दो हाथ में कमल पुष्प धारित है । माँ एक भुजा से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं तथा एक भुजा से उन्होंने भगवान् कार्तिक को पुत्र स्वरुप में पकड़कर गोद में धारण किया हुआ है। 

माँ स्कंदमाता की आराधना करने का मंत्र :
माँ स्कंदमाता का वाहन सिंह है। इस मंत्र के उच्चारण के साथ माँ की आराधना करने से समस्त शुभ कार्यों की पूर्णता होती है। 
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी।

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी।।


माँ दुर्गा के इस मातृ रूप की आराधना के लिए एक मंत्र यह भी है 

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ स्कन्द माता की पूजा विधि : 
नवरात्री के पांचवें दिन अर्थात पंचमी तिथि को माँ के स्कन्द माता स्वरुप की पूजा करके भगवती दुर्गा को केले के फल का भोग लगाना चाहिए और इस  प्रसाद को सबको वितरित चाहिए। ऐसा करने से साधक की बुद्धि का सर्वांगीण विकास होता है।  स्कंद माता का रूप शुभ्र वर्ण का होता है। माँ स्कन्द माता  वात्सल्य की मूर्ति हैं अतः वैदिक मान्यता के अनुसार स्कन्द माता की पूजा और आराधना करने से मनवांछित संतान की प्राप्ति निश्चित ही होती है।  स्कंदमाता सौरमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, इनकी साधना करने वाले साधक को अलौकिक तेज प्राप्त होता है। तथा मां अपने भक्तों को पुत्र के सामान स्नेह देकर सभी दुखों का निवारण करती है। 









Sunday, September 24, 2017

चतुर्थ नवरात्री : जीवन में तन मन और धन से सुखी होना चाहते है तो करें माँ कुष्मांडा के इस मन्त्र का जाप !

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माँ कुष्मांडा की आराधना नवरात्र के चौथे दिन की जाती है, अतः  माँ दुर्गा का चौथा अवतार माँ कुष्मांडा ही है। कुष्मांडा का अर्थ है ब्रह्माण्ड स्वरूपी अंड के रूप में विद्यमान देवी, जिन्होंने इस पूरे ब्रह्माण्ड का निर्माण किया है। हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित प्रसंगों के अनुसार भगवान् विष्णु ने जब ब्रह्माण्ड का निर्माण प्रारम्भ किया तो माँ दुर्गा ने खिलते पुष्प की भांति मुस्कान बिखेरी, जिससे सृष्टि का निर्माण हुआ। माँ कुष्मांडा की अष्ट भुजाएं है जिनमे वे कमंडल, धनुष, तीर, अमृत कलश, कमल,चक्र, गदा, माला  आदि धारण किये हुए रहती है।    

आध्यात्मिक भाव में माँ कुष्मांडा "अनाहत चक्र" को धारण करती है।  माँ कुष्मांडा की आराधना से साधक को सुस्वास्थ्य और धन की प्राप्ति होती है। माँ कुष्मांडा जीवन में आने वाली समस्त विपत्तियों का नाश करके जीवन को अन्धकार से प्रकाश की और ले जाती है।  माँ कुष्मांडा की सत्य भाव से आराधना करने के लिए निम्नांकित मन्त्र का जाप करने से माँ शीघ्र प्रसन्न होकर मनवांछित फल प्रदान करती है 

                                                    सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
                                             दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥


Saturday, September 23, 2017

तीसरा नवरात्रा : माँ चंद्रघंटा की आराधना से होगी बल और यश में वृद्धि

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नवरात्र का तीसरा दिन माँ चंद्र घंटा की आराधना का दिन होता है , अर्थात माँ चंद्रघंटा ही भगवती का तीसरा रूप है। माँ चंद्रघंटा सिंह की सवारी करती है, जिनकी दस भुजाएं है, तीन नेत्र है और मस्तक पर घंटाकर अर्धचंद्र सुशोभित है, इसीलिए माँ जगदम्बे के इस रूप को चंद्रघंटा की संज्ञा दी गई है। माँ चंद्रघंटा की आराधना करने वाला साधक सदैव बलशाली और यशस्वी होता है।    
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शास्त्रों के अनुसार  माँ चंद्रघंटा की पूजा आराधना करने से सभी जन्मों के पापों से मुक्ति मिलका मोक्ष्य की प्राप्ति होती है।  माँ चंद्रघंटा के आठ हाथों में अस्त्र शस्त्र धारण किये हुए है अतः शत्रु दूर से हि भयाक्रांत होकर उसका नाश हो जाता है।  शुद्ध अंतःकरण से माँ चंद्रघंटा की पूजा करते समय निम्नांकित मन्त्र का वाचन और जाप करें तो माँ चंद्रघंटा अवश्य ही प्रसन्न होकर मनवांछित फल प्रदान करती है।

                                                 पिण्डज प्रवरारुढ़ा चण्डकोपास्त्र कैर्युता |
                                                 प्रसादं तनुते मह्यं चंद्र घंष्टेति विश्रुता ||

Friday, September 22, 2017

नवरात्री का द्वितीय दिन : मां ब्रह्मचारिणी की तप और त्याग की कथा, कैसे करें मां ब्रह्मचारिणी की आराधना?

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नौ दिनों तक अनवरत चलने वाला माँ भगवती की आराधना का पर्व प्रतिपदा से ही प्रारम्भ हो चुका है। इस भक्ति और शक्ति के महापर्व नवरात्र के दूसरे दिन देवी के दुसरे रूप अर्थात  ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा की जाती है। माँ भगवती के नौ प्रतिरूप का दूसरा स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी है। तप, त्याग और संयम का आचरण करने वाली माँ भगवती को ही माँ ब्रह्मचारिणी कहा गया है, माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप परम ज्योति से परिपूर्ण व  अलौकिक भामय है। माँ ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में माला व बाएं हाथ में कमंडल है। देवी के इस द्वितीय स्वरूप की आराधना और भक्तियुतसाधना से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है।

मां ब्रह्मचारिणी की उपासना करने का मंत्र इस प्रकार है:

मां ब्रह्मचारिणी की उपासना का मंत्र
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

या देवी सर्वभू‍तेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है।  मां ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं  'हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार नमस्कार है. मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं.' माता का आशीर्वाद पाने के लिए नवरात्रि के दूसरे दिन इसका जाप जरूर करना चाहिए।

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मां ब्रह्मचारिणी की कथा
पूर्वजन्म में माँ ब्रह्मचारिणी देवी ने राजा हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तप के कारण इनमे इतनी सिद्धियां  हो गई कि इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल कंद मूल और फल-फूल खाकर ही व्यतीत किये और  सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।
कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप में भी घोर कष्ट सहकर तप किया। तीन हजार वर्षों तक केवल टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और फिर भी भगवान शंकर की आराधना करती रहीं।  इसके पश्चात भी कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को भी खाना छोड़कर तपस्या करते रहने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया, देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व महान कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की।  यह केवल आप से ही संभव था।  आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी आपको अवश्य ही पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ।  जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं।  मां भगवती का ब्रह्मचारिणी रूप का सन्देश यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए. मां ब्रह्मचारिणी देवी की आराधना करने से प्राप्त कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। 

Thursday, September 21, 2017

नवरात्र 2017 : कैसे करें माँ को प्रसन्न, जानिए वैदिक पूजा पाठ व शुभ मुहूर्त का सही समय

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शारदीय नवरात्रि 2017
हिंदी पंचांग के अनुसार इस वर्ष के शारदीय नवरात्रि 21 सितम्बर से प्रारम्भ हो रहे है। जैसा कि ज्ञात है इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नव रूपों की पूजा की जाती है, अतः इन नौ पवित्र दिनों की रात्रियों का समय नवरात्र कहलाता है। माँ दुर्गा नवरात्रि में नौ दिनों तक अपने उपासकों पर ममतामयी कृपा बरसाती हैं। और सभी प्रकार के अमंगल से भक्तों की रक्षा करती है।  

शारदीय नवरात्रि 2017 का घाट स्थापना का शुभ मुहूर्त-
21 सितंबर को प्रतिपदा है अतः माँ दुर्गा के प्रथम रूप "शैलपुत्री" की पूजा होगी और नवरात्र का प्रारम्भ हो जायेगा। 21 सितंबर को प्रातः 6:00 बजे से 8:20 बजे तक का समय अमृत योग बन रहा है। यदि इस समय काल में आप घर में घट स्थापना कर सकते है तो सर्वश्रेष्ठ फल मिलेगा, क्योंकि अमृत योग को ज्योतिष काल गणना के अनुसार सबसे अच्छा माना गया है। 

घट स्थापना कैसे करें ?
घट स्थापना हेतु सर्वप्रथम जौ को फर्श पर डालें, उसके बाद उस जौ पर मिट्टी का कलश स्थापित करें। तत्पश्चात उस कलश पर स्वास्तिक बनाएं, और कलश पर मौली बांधकर उसमें जल भरें। कलश में अक्षत, पूजा सुपारी, पुष्प, पंच मेवा और मुद्रा डालें।

अखंड दीप क्यों व कैसे जलाएं ? 
शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि की अवधि में अखंड दीप जलाने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिस घर में अखंड दीप जलता है वहां माता दुर्गा की कृपा दृष्टि सदैव बनी रहती है। अखंड दीप जलाने वाले साधक को नौ दिन तक जमीन पर ही बिस्तर लगाकर सोना चाहिए । किसी भी परिस्थिति में अखंडदीप बुझना नहीं चाहिए और नौ दिन तक साफ़ सफाई और पवित्रता का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

किस दिन करें माँ के किस रूप की पूजा ?
चूंकि शारदीय नवरात्र‌ि इस साल थोड़ा जल्दी अर्थात 21 सितंबर से शुरू हो रहा है, अतः सर्दियाँ भी प्रारम्भ नहीं हुई है। माँ दुर्गा नवरात्र के नौ दिनों अलग अलग रूपं में प्रकट होकर अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। इसीलिए नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
21 सितंबर को प्रथम नवरात्रि प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा होगी। 
22 सितंबर को नवरात्रि का दूसरा दिन है। इस दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी।  
23 सितंबर को नवरात्रि का तीसरा दिन है।  और इस दिन माता चन्द्रघंटा की पूजा होगी। 
24 सितंबर को नवरात्रि का चौथा दिन  है और इस दिन माता कुष्मांडाँ की पूजा होगी। 
25 सितंबर को नवरात्रि का पांचवा दिन है और इस दिन माता स्कंदमाता की पूजा होगी।
26 सितंबर को नवरात्रि का छठा दिन है और इस दिन माता कात्यायनी की पूजा होगी। 
27 सितंबर को सपत्मी मतलब नवरात्रि का सातवा दिन  है।  इस सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा होगी। 
28 सितंबर को अष्ठमी अर्थात नवरात्रि का अठवा दिन है। इस आठवें दिन माता महागौरी की पूजा होगी। 
29 सितंबर को नवमी अर्थात नवरात्रि का नौवा दिन  है।  इस नौवें दिन माता सिद्धिदात्रि की पूजा होगी।