Thursday, August 31, 2017

बड़ा सवाल : क्या पिछले कुछ दशकों में डॉक्टरों ने खुद ही अपनी साख गिरा ली है ?

 

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यदि हैडिंग पढ़कर आप चौंक गए है तो आपका चौंकना बिलकुल जायज़ है, क्यों नहीं ? मामला है ही कुछ ऐसा। सदियों से हमारे समाज ने डॉक्टरों को भगवान् का दर्जा दिया है और उसे निभाया भी, किन्तु हाल की कुछ घटनाओं पर गौर करें तो पूरे डॉक्टरी पेशे पर ही सवालिया निशान लग जाता है। कुछ हफ़्तों पहले घटित हुई BRD मेडिकल कॉलेज गोरखपुर की घटना हो चाहे 29 अगस्त को उम्मीद हॉस्पिटल, जोधपुर , राजस्थान की घटना हो, दोनों में से किसी भी घटना को हलके में नहीं लिया जा सकता। दोनों ही घटनाओं में एक समानता है वह है मानवता का ह्रास। यदि दोनों ही घटनाओं में समाज के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति यानि कि डॉक्टर साहब ने अपने कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वहन किया होता तो आज वे सैंकड़ों बच्चे हमारे बीच होते, जिनसे जीने का अधिकार इन तथाकथित पेशेवरों ने छीन लिया। यहाँ पर पेशेवर शब्द का इस्तेमाल सही रहेगा क्योंकि पेशे और सेवा में बहुत फर्क होता है। पेशा धन कमाने मात्र तक सीमित होता है जबकि सेवा का न तो कोई मोल होता है और न कोई सीमा। आर्थिक युग के इस दौर में आज भी हमारे देश में डॉक्टर को सबसे उच्च स्थान पर रखा गया है, ऐसा माना जाता है कि भगवान जीवन दाता है और डॉक्टर हमारा जीवन रक्षक है। किन्तु आर्थिक युग में डॉक्टर साहब शायद जनता के भरोसे को बरकरार नहीं रख पाए। तभी तो आये दिन अस्पतालों में डॉक्टरों की लापरवाही के चलते मरीजों के परिजनों का गुस्सा फूट पड़ता है, और इसका शिकार डॉक्टर को ही होना पड़ता है। कुछ महीनों पहले महाराष्ट्र में ऐसा ही एक वाकया हुआ था जिसमे मरीज के परिजनों ने लापरवाही का हवाला देते हुए डॉक्टर की जमकर पिटाई कर दी, और अस्पताल में भी खूब तोड़फोड़ की। विरोधस्वरूप पूरे देश के डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी, और लाखों मरीज एक मानव निर्मित त्रासदी का शिकार हो गए। 29 अगस्त को ही एक और भयानक चेहरा सामने आया इस तथाकथित भगवान् का, गोरखपुर के ही सरकारी अस्पताल के सरकारी 3-4 डॉक्टर निजी अस्पताल में चोरी छुपे प्रैक्टिस करते पकडे गए, और तो और इनमें से एक डॉक्टर ने तो इस स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम देने वाले TV चैनल के स्वस्थ और हट्टे कट्टे रिपोर्टर को गंभीर बीमार बताकर महज चंद पैसों के लिये स्वयं के अस्पताल में बेवजह भर्ती होने की सलाह दे डाली। इसे क्या कहेंगे आप, सेवा या प्रोफेशन यानी की धंधा ?

आये दिन हम सुनते रहते है कि देश में सिजेरियन प्रसव का अनुपात सुरसा के मुख की तरह बढ़ता जा रहा है , महज चाँद पैसे के लिए एक साधारण प्रसव को भारी भरकम बजट वाले सिजेरियन प्रसव में बदल देना तो आजा कल आम बात हो गई है। ये बात और है कि मरीज डॉक्टर साहब के बारी भरकम इलाज का खर्च वहां करने की स्थिति में है या नहीं लेकिन डॉक्टर साहब को इससे क्या लेना उन्हें तो अपना पैसा कमाना है भाई ! महँगी पढ़ाई करके पैसा कमाने के लिए ही तो डॉक्टर बने है, कोई जनसेवा करने के लिए थोड़े ही न डॉक्टर बने है।
वाह डॉक्टर साहब वाह ! -" आप डॉक्टर हो या धंधे वाले मतलब पेशेवर

डॉक्टर के पद की गरिमा इतनी ज्यादा है कि बिना वजह के एक आम इंसान उनके आगे खड़े रहकर नज़र भी मिलाने से भी कतराता है। फिर यदि डॉक्टर इस भावना के साथ खिलवाड़ करे तो फिर भगवान् तो क्या एक आम इंसान कहलाने का भी हकदार नहीं है। हिप्पोक्रेटिक ओथ को याद रखे तो एक डॉक्टर सदैव ही सेवा को प्रथम धर्म मानेगा, और यदि नोटों पर लिखा गवर्नर का वचन याद रखेगा, तो एक डॉक्टर कभी भी सेवा नहीं कर पायेगा अपितु पेशेवर बन कर रह जाएगा। यह लेख एक गहरा चिंतन है जो कि केवल सम्बद्ध डॉक्टरों के लिए इंगित है, जिन्होंने निज स्वार्थवश इस महान सेवाभावी पेशे का अनादर किया है । सेवाभावी चिकित्सक, समाज के लिए सदैव पूजनीय है और रहेंगे, उनके ह्रदय को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है ।



लेखक  : श्री  भगवती लाल स्वर्णकार (लेखक एक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)


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