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Friday, October 6, 2017

क्या महर्षि वाल्मीकि डाकू नहीं ऋषि की संतान थे? क्या आप झूठा इतिहास पढ़ रहे थे? पढ़िए सच्चा वैदिक इतिहास

 
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जैसा की विदित है भारत सदियों तक एक सर्वगुण संपन्न राष्ट्र और विश्व गुरु रहा है।  ये गौरवशाली सर्वोच्च आसान कुछ लोगों को रास नहीं पाया और भारत के महान इतिहास के साथ छेड़ छाड़ करके; एक छद्म इतिहास तैयार कर दिया। ऐसा ही एक झूठा तथ्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में प्रचलित है के वे एक डाकू थे, और बाद में ऋषि बनकर रामायण की रचना की। महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में लोगों में एक भ्रान्त धारणा फैली हुई है कि वे आरम्भ में डाकू थे। किन्तु रामायण में उनके सम्बन्ध में एक ऐसी सत्य घटना उपलब्ध होती है जिसे पढ़कर आप आश्चर्य से चकित हो जायेंगे । वाल्मीकिजी के सम्बन्ध में रामायण को ही प्रामाणिक माना जा सकता है। माता सीताजी की पवित्रता की साक्षी देते हुए उन्होंने भगवन श्री राम से कहा था कि-
                                                              प्रचेतसोऽहं दशम: पुत्रो राघवनन्दन।
                                                          मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम्।।


"हे राम ! मैं प्रचेतस मुनि का दसवाँ पुत्र हूँ। मैंने मन, वचन और कर्म से कभी पापाचरण नहीं किया है। और उसी का साक्ष्य देते हुए कहता हूँ की माता सीता एकदम पवित्र है।" 

इस श्लोक के विद्यमान रहते हुए महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में यह कैसे कहा जा सकता है कि वे यौवन अवस्था में वे डाकू रहे होंगे? व्यवहारिक तौर पे एक डाकू का इतना ज्ञानी होना संभव भी नहीं है की वह कुछ ही माह में रामायण जैसे महाकाव्य की रचना कर दे।  इससे यही सिद्ध होता है की महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में इतिहास को तोड़ मरोड़ कर बताया गया। यदि संयोग से कोई डाकू वाल्मीकि भी रहे होंगे तो वे अवश्य ही कोई दुसरे व्यक्ति हो सकते हैं। एक ही नाम के अनेक व्यक्तियों का होना कोई असम्भव घटना नहीं है। असली वाल्मीकि एक महर्षि की संतान थे और परम ज्ञानी थे और  रामायण की रचना करने वाले वे ही थे।

Monday, September 4, 2017

भारत का गौरवशाली इतिहास एवं अफ्रीका का हिंदुत्ववादी इतिहास

 
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अफ्रीका महाद्वीप एक विशाल भूखंड है, जिसमे कई देश है । इसके उत्तर में लीबिया, इजिप्ट , मोरक्को आदि देश है । जिसमे सहारा जैसा विस्तीर्ण मरुस्थल भी है  जहां तेज लू में रेत एक स्थान से दूसरे स्थान में उड़ने से देखते ही देखते  बड़े टीले बनते या मिटते रहते है । समय समय मे बनने - बिगड़ने वाले इस भु-जंजाल में किंतने ही ऐतिहासिक रहस्य पृथ्वी की तह में छिपकर नष्ठ हो गए होंगे, या छिप गए होंगे । मध्य अफ्रीका में कई स्थानों में ऐसा घना जंगल है  उसके अंदर क्या क्या रहस्य छिपे होंगे, किंतने ही मंदिर -महल नष्ठ हुए पड़े होंगे किसी को कुछ पता नही। अफ्रीका में गोरे लोगो ने अपनी निजी धाक जमाते समय  प्राचीन सभ्यता  के अवशेषों को चुपचाप नष्ठ करवा दिया हो, तो बड़ी बात नही ।

उतरी अफ्रीका में मुसलमान बने अरबो ने  इस्लाम पूर्व सभ्यता को दीमक ओर टिड्डीयो की तरह नष्ठ करना निजी धर्म ही मान लिया था।  फिर भी पिरामिड बड़े सोभाग्य से इसलिए बच पाए  की राक्षसी शक्ति पिरामिड की विशालता तथा मजबूती देखकर ढीली पड़ गयी। पिरामिड के अंदर धरी सम्पति को लूटकर ही मुसलमानो को संतोष करना पड़ा। इसके अतिरिक्त  ईसाई तथा अरबी मुसलमानो ने  अफ्रीका को मानवीय शिकार तथा लूट की जागीर समझकर  अफ्रीका में जहां  तहां छापे मारकर  स्थानीय, दरिद्र , अनपढ़, भयभीत  हब्सी स्त्री पुरषों को पकड़-पकड़ कर लूटकर, मारकर उनका बलात्कार कर  नावों में भर भर कर  विश्व की अनेक मंडियों में बेचना आरम्भ कर दिया ।

गोरे ईसाइयो के हाथ मे पड़ा हब्सी ईसाई कहलाया, ओर अरबी मुसलमानो के हाथ पड़े हब्सी , हब्सी मुसलमान कहलाये । हालांकि अफ्रीका का पूर्ण हिन्दू इतिहास इन ईसाइयो ओर मुसलमानो ने खत्म करने की चेष्ठा की, लेकिन इतिहास को कोई मिटा नही सकता । तो उसी इतिहास और नजर डालते है :-

अफ्रीका का रामायण ओर राम से सम्बन्ध:
अफ्रीका का एक देश इजिप्ट नाम से जाना जाता है,  यह नाम अजपति राम के नाम पर पड़ा हुआ है। प्रभु श्री राम के कई नामो में  एक अन्य नाम अजपति भी था । उसी अजपति का अपभ्रंश इजिप्ट होकर रह गया। अफ्रीका के सारे लोग Cushiets ( कुशाइत ) कहे जाते है । इसका अर्थ यही है वे प्रभु श्री राम के पुत्र कुश के प्रजाजन ही है। अफ्रीका में राम की ख्याति इसलिए फैली, क्यो की अफ्रीका खण्ड रावण के कब्जे में था । रावण के भाईबंद माली - सुमाली  के नाम से अफ्रीका में दो देश आज भी है ही ।

रामायण में जिक्र है लोहित सागर का, आपने कभी गौर किया कि वो लोहित सागर था, तो अब कहाँ है ?  लंका की शोध में जब वानर उड़ान भरते थे, तब लोहित सागर का उल्लेख आता है ।  वह लोहित सागर अफ्रीका खण्ड के करीब ही है। जिसे आज RED SEA  अथवा लाल सागर के नाम से जाना जाता है।  हो सकता है कि वह पिरामिड रामायण कालीन  दैत्यों के मरुस्थल  स्तिथ किले या महल रहे हो  , वे जीते जाने के बाद उनके आगे राम विजय के चिन्ह के रूप में  रामसिंह के The sphinx नाम की प्रतिमा बना दी गयी हो ।

अफ्रीका में केन्या नाम का देश है, हो सकता है वहां " कन्या " नाम की कोई देवी रही हो , ओर उसकी पूजा की जाती हो । कन्या से  ही केन्या बना है । और कन्या तो संस्कृत शब्द ही है ।


अफ्रीका के हिन्दू नगर :
दारेसलाम नाम का जो  सागर तट पर प्रमुख नगर अफ्रीका में है,  वह स्पष्ठतया  द्वारेशाल्यम ( द्वार-इशालायं ) संस्कृत नाम है । उसका अभिप्राय यह है कि  उस नगर में कोई विशाल शिव मंदिर ,  विष्णु मंदिर या गणेश मंदिर रहा हो । अफ्रीका के  एक प्रदेश का नाम रोडेशिया है । एक  RHODES  नाम का प्रदेश भी है । Sir Cecil Rhodes  नाम के एक अंग्रेज के कारण रोडेशिया आदि नाम प्रचलित हुआ, यह सामान्य धारणा है । किन्तु होड्स  होडेशिया आदि हम "हत " यानि ह्रदय  यानी heartland  अर्थात ह्रदय प्रदेश या हार्दिक प्रदेश  इसका मूल संस्कृत नाम है । Sir Cecil  का मूलतः श्री शुशील नाम है । ताँगानिका  नाम का एक अफ्रीकी प्रदेश है , जो तुंगनायक यानि श्रेष्ठ नेता इसका अपभ्रंस है ।द्वारेशलम उसी प्रदेश में आता है ।

मॉरीशस :
अफ्रीका के पूर्ववर्ती किनारे के पास  मारिशश द्वीप है ।  राम के बाण उर्फ रॉकेट ने  मारीच को वहां ही गिराया था । अतः उस द्वीप का नाम मासिशश पड़ा । या यह हो सकता है, की मारीच ने राम के भय से वहां शरण ली हो, इस कारण उस द्वीप का नाम मॉरीशस पड़ा हो । कुश के पिता हाम ( Ham ) थे ,  ऐसा इथोयोपिया की पुस्तकों में लिखा है । हां हीं  आदि संस्कृत में भगवान के रूप बीजाक्षर है । इसी कारण राम का नाम वहां हाम पड़ गया ।


अफ्रीका की नील, गंगा/ सरस्वती:
अफ्रीका के इजिप्ट में जो नील ( इसका उच्चार नाइल किया जाता है )  नदी है, उसे दुनिया की सबसे प्रमुख नदी में गिना जाता है ।  प्राचीन वैदिक परंपरा के अनुसार वह बड़ी पवित्र भी मानी गयी है । नील विश्लेषण दैवीय गुणों का धोतक है । नील नदी का उद्गम कहा से है, इसका पता ही यूरोपीय लोग नही लगा सके । लेकिन अंत मे प्राचीन संस्कृत पुराणों से यह समश्या हल हुई । भारत मे ईस्ट इंडिया कम्पनी  ने जब यहां पुराणों का अध्यनन करवाया तो पुराणों में नील सरिता नदी का उल्लेख था, जिसका चंद्रगिरि की पहाड़ियों से उद्गम था । पुराणों में दिए भौगोलिक नक्शे के अनुसार यह सच साबित हुआ, ओर नील नदी का उद्गम मिल भी गया । किंतने आश्चर्य की बात है, की जहां देखो वहां भारतीयों का इतिहास मिलता है ।

अफ्रीका मूल रूप से हिन्दू राष्ट्र ही था । आज भी Kenya (  कन्या )  दारेसलाम ( द्वारेशलम ) Rhodesia ( रुद्रदेश) Nile  ( नील) ,  इजिप्ट ( अजपति ) Cairo ( कौरव )  अल-अक्षर ( यानि अल-ईश्वर  )  विश्वविद्यालय आदि  हिन्दू संस्कृत नाम अफ्रीका खण्ड से जुड़े हुए है । 


Tuesday, August 29, 2017

हमारे महापुरुष : हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचन्द की जीवन गाथा, जन्मदिवस विशेष

 
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 एक समय था, जब भारतीय हॉकी का पूरे विश्व में दबदबा था। उसका श्रेय जाता है मेजर ध्यानचन्द को।  मेजर ध्यानचंद जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयाग, इलाहाबाद में २९ अगस्त, १९०५ को हुआ था। उनके पिता श्री शामेश्वर दत्त सिंह भारतीय सेना में सूबेदार थे। पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए  १६ वर्ष की अल्प आयु में किशोर ध्यानचन्द को भी भारतीय सेना में भर्ती होने का अवसर मिला। ध्यानचंद की रुचि कुश्ती में अधिक थी परन्तु भगवान् को कुछ और ही मंजूर था और सूबेदार मेजर बाले तिवारी इसके निमित्त बने। सूबेदार मेजर बाले तिवारी ने ध्यानचंद को हॉकी के लिए प्रोटाहित किया और सहयोग भी किया। बस फिर क्या था उसके बाद ध्यानचंद ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा और  वे विश्व हॉकी के पर्याय बन गये।

सेना में भर्ती होने के कुछ दिन पश्चात ही ध्यानचंद अपनी रेजिमेण्ट की टीम में चुन लिये गये। उनका मूल नाम ध्यानसिंह था; पर वे प्रायः चाँदनी रात में अकेले घण्टों तक हॉकी का अभ्यास करते रहते थे। इससे उनके साथी तथा सेना के अधिकारी उन्हें ‘चाँद’ कहने लगे। फिर तो यह उनके नाम के साथ ऐसा जुड़ा कि वे ध्यानसिंह से ध्यानचन्द हो गये। आगे चलकर वे ‘दद्दा’ ध्यानचन्द के नाम से मशहूर हो गए ।

चार साल तक ध्यानचन्द अपनी रेजिमेण्ट की टीम में रहे। १९२६ में वे सेना एकादश और फिर राष्ट्रीय टीम में चुन लिये गये। इसी साल भारतीय टीम ने न्यूजीलैण्ड का दौरा किया। इस दौरे में पूरे विश्व ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को देखा। गेंद उनके पास आने के बाद फिर किसी अन्य खिलाड़ी तक नहीं जा पाती थी। कई बार उनकी हॉकी की जाँच की गयी, कि उसमें गोंद तो नहीं लगी है। अनेक बार खेल के बीच में उनकी हॉकी बदली गयी; पर वे तो अभ्यास के धनी थे। वे उल्टी हॉकी से भी उसी कुशलता से खेल लेते थे। इसीलिए उन्हें लोग हॉकी का जादूगर’ कहते थे।
भारत ने सर्वप्रथम १९२८ के एम्सटर्डम ओलम्पिक में भाग लिया। ध्यानचन्द भी इस दल में थे। इससे पूर्व इंग्लैण्ड ही हॉकी का स्वर्ण जीतता था; पर इस बार भारत से हारने के भय से उसने हॉकी प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लिया। भारत ने इसमें स्वर्ण पदक जीता। १९३६ के बर्लिन ओलम्पिक के समय उन्हें भारतीय दल का कप्तान बनाया गया। इसमें भी भारत ने स्वर्ण जीता। इसके बाद १९४८ के ओलम्पिक में भारतीय दल ने कुल २९ गोल किये थे। इनमें से १५ अकेले ध्यानचन्द के ही थे। इन तीन ओलम्पिक में उन्होंने १२ मैचों में ३८ गोल किये।

१९३६ के बर्लिन ओलम्पिक के तैयारी खेलों में जर्मनी ने भारत को ४-१ से हरा दिया था। फाइनल के समय फिर से दोनों टीमों की भिड़न्त हुई। प्रथम भाग में दोनों टीम १-१ से बराबरी पर थीं। मध्यान्तर में ध्यानचन्द ने सब खिलाड़ियों को तिरंगा झण्डा दिखाकर प्रेरित किया। इससे सबमें जोश भर गया और उन्होंने धड़ाधड़ सात गोल कर डाले। इस प्रकार भारत ८-१ से विजयी हुआ। उस दिन १५ अगस्त था। कौन जानता था कि ११ साल बाद इसी दिन भारतीय तिरंगा पूरी शान से देश भर में फहरा उठेगा।

१९२६ से १९४८ तक ध्यानचन्द दुनिया में जहाँ भी हॉकी खेलने गये, वहाँ दर्शक उनकी कलाइयों का चमत्कार देखने के लिए उमड़ आते थे। आस्ट्रिया की राजधानी वियना के एक स्टेडियम में उनकी प्रतिमा ही स्थापित कर दी गयी। ४२ वर्ष की अवस्था में उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया। कुछ समय वे राष्ट्रीय खेल संस्थान में हॉकी के प्रशिक्षक भी रहे।

भारत के इस महान सपूत को शासन ने 1956 में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। ३ दिसम्बर, १९७९ को उनका देहान्त हुआ। उनका जन्मदिवस 29 अगस्त भारत में ‘खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
     

Sunday, August 27, 2017

हमारे महापुरुष : हिंदू सेवा प्रतिष्ठान के संस्थापक, प्रखर राष्ट्रवादी श्री अजीत कुमार जी के जन्मदिवस पर शत शत नमन

 
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साधारणतया व्यक्ति बनी बनाई रीति पर चलते हैं, जबकि कुछ बिरले व्यक्तित्व अपनी कल्पनाशीलता से  समूचे विश्व के लिए नए उदाहरण स्थापित कर जाते है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक माननीय श्री अजीत जी दूसरी श्रेणी के कार्यकर्ता थे। उनका जन्म २७ अगस्त, १९३४  
 को कर्नाटक के गुडीवंडेयवर जिला के कोलार नामक स्थान पर हुआ था। श्रीमती पुट्टताईम्म तथा वरिष्ठ सरकारी अधिकारी श्री ब्रह्मसुरय्य की  आठ संतानों में से एक थे श्री अजीत जी।

प्राथमिक शिक्षा ननिहाल में पूरी कर वे पिताजी के साथ बंगलौर आ गये। यहां उनका संघ से सम्पर्क हुआ। कर्नाटक प्रांत प्रचारक श्री यादवराव जोशी से वे बहुत प्रभावित थे। अभियन्ता की शिक्षा प्राप्त करते समय वे 'अ.भा.विद्यार्थी परिषद' में भी सक्रिय रहे। अपनी कक्षा में सदा प्रथम श्रेणी पाने वाले अजीत जी ने इलैक्ट्रिक एवं मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री स्वर्ण पदक सहित प्राप्त की। उनकी रुचि खेलने, परिश्रम करने तथा साहसिक कार्यों में थी। नानी के घर में कुएं से १०० बाल्टी पानी वे अकेले निकाल देते थे। एक शिविर में उन्होंने १,७५२ दंड-बैठक लगाकर पुरस्कार पाया था। 

१९५७ में शिवगंगा में आयोजित एक वन-विहार कार्यक्रम में उन्होंने प्रचारक बनने का निश्चय किया। उन्हें क्रमशः नगर,  महानगर, विभाग प्रचारक आदि जिम्मेदारियां मिलीं। संघ शिक्षा वर्ग में कई बार वे मुख्यशिक्षक रहे। वे हर काम उत्कृष्टता से करते थे। कपड़े धोने से लेकर सुखाने तक को वे एक कला मानते थे। गणवेश कैसा हो, इसके लिए लोग उनका उदाहरण देते थे। कार्यक्रम के बाद भी वे पेटी और जूते पॉलिश कर के ही रखते थे।

अजीत जी ने प्रख्यात योगाचार्य श्री पट्टाभि तथा श्री आयंगर से योगासन सीखे। फिर उन्होंने संघ शिक्षा वर्ग के लिए इसका पाठ्यक्रम बनाया। इसके बाद उन्होंने बंगलौर के डा.कृष्णमूर्ति से आरोग्य संबंधी कुछ आवश्यक सूत्र सीखकर उनका प्रयोग भी विभिन्न प्रशिक्षण वर्गों में किया। योग और शरीर विज्ञान के समन्वय का अभ्यास उन्होंने डा. नागेन्द्र के पास जाकर किया। अपने ये अनुभव उन्होंने ‘योग प्रवेश’ तथा ‘शरीर शिल्प’ नामक पुस्तक में छपवाये।

१९७५ में आपातकाल लगने पर वे भूमिगत होकर काम करते रहे; पर एक सत्याग्रह कार्यक्रम के समय वे पहचान लिये गये। पहले बंगलौर और फिर गुलबर्गा जेल में उन्हें रखा गया। वहां भी उन्होंने योग की कक्षाएं लगायीं।

अजीत जी की मान्यता थी कि समाज में अच्छे लोगों की संख्या बहुत अधिक है। अतः उन्होंने ‘हिन्दू सेवा प्रतिष्ठान’ संस्था के माध्यम से ऐसे सैकड़ों युवक व युवतियों को जोड़ा। उन्हें थोड़ा मानदेय एवं प्रशिक्षण देकर अनेक सेवा कार्यों में लगाया गया। संस्कृत संभाषण योजना के सूत्रधार भी अजीत जी ही थे। १९८० के दशक में उन्होंने ऐसी कई योजनाओं को साकार किया।

उनके मन में और भी अनेक योजनाएं थीं, जिनके बारे में वे चर्चा किया करते थे। उनका परिश्रम और काम के प्रति छटपटाहट देखकर लोग उन्हें saint in a hurry कहते थे। १९९० में वे कर्नाटक प्रान्त प्रचारक बनाये गये। दिसम्बर मास में बंगलौर में विश्व संघ शिविर होने वाला था, अतः 
३ दिसम्बर, १९९० को उसकी तैयारी के लिए अजीत जी के साथ नरेन्द्र जी, विजयेन्द्र नरहरि तथा गणेश नीर्कजे कार से कहीं जा रहे थे; पर नेलमंगल के पास एक ट्रक से हुई भीषण टक्कर में चारों कार्यकर्ता असमय काल-कवलित हो गये।

एक बार भैया जी दाणी के पूछने पर अजीत जी ने कहा था कि- "जब तक प्राण है, तब तक संघ कार्य करूंगा।" उन्होंने मर कर भी अपना यह संकल्प पूरा कर दिखाया। वैदिक भारत संगठन ऐसे राष्ट्रभक्त को उनकी जनतिथि २७  अगस्त पर सादर नमन करता है। 

Saturday, August 26, 2017

२६ अगस्त का गौरवशाली इतिहास, चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का जौहर

 
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जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए ‘जय हर-जय हर’ कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर ‘जौहर’ बन गया। जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है, जिन्होंने २६ अगस्त,१३०३ को १६,००० क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था।

पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उसे अपनी पत्नी बनाकर ले आया। इस प्रकार पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी।

पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी। वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था। उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा; पर राव रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। अब वह धोखे पर उतर आया। उसने रतनसिंह को कहा कि वह तो बस पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है।

रतनसिंह ने खून-खराबा टालने के लिए यह बात मान ली। एक दर्पण में रानी पद्मिनी का चेहरा अलाउद्दीन को दिखाया गया। वापसी पर रतनसिंह उसे छोड़ने द्वार पर आये। इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गये। अब यह शर्त रखी गयी कि यदि पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा।

यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया; पर पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई। अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं। अतः वह अकेले नहीं आएंगी। उनके साथ पालकियों में ८०० सखियां और सेविकाएं भी आएंगी।

अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें पद्मिनी के साथ ८०० हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गये। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था। वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े।

कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में राव रतनसिंह तथा हजारों सैनिक मारे गये। जब रानी पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने जौहर का निर्णय किया।

रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण शृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। ‘जय हर-जय हर’ का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। जब युद्ध में जीत कर अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं।

Thursday, August 24, 2017

हमारे महापुरुष : अमर शहीद शिवराम हरी राजगुरु की जीवन गाथा

 
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माँ भारती की गुलामी की बेड़ियाँ काटने वाले शहीदों का बलिदान देश कभी भूल नहीं सकता।  आजादी के दीवानों का हाल ये था की माँ भारती के लिए स्वयं को न्योछावर कर देने की होड़ सी लग गयी थी स्वतन्त्रता संग्राम में। ऐसे ही एक दीवाने थे अमर शहीद श्री राजगुरु जिनका ऋण ये देश  नहीं चूका पायेगा।  

शिवराम हरि राजगुरु का जन्म २४ अगस्त, १९०८ को श्री हरि नारायण और श्रीमती पार्वतीबाई के पुत्र  के रूप में  पुणे के पास खेड़ा वर्तमान नाम राजगुरु नगर में हुआ था। हरिनारायण राजगुरु के  पूर्वज पंडित कचेश्वर को छत्रपति शिवाजी के प्रपौत्र साहू जी महाराज ने राजगुरु का पद दिया था। तब से इस परिवार को राजगुरु के नाम लगने लगा।

छह वर्ष की अबोध अवस्था में ही शिवराम हरी राजगुरु के पिताजी श्री हरिनारायण जी का देहावसान  हो गया। पढ़ाई में कम और खेलकूद में अधिक रुचि होने के कारण उनके भाई ने उन्हें डांटा इस पर क्रोधित होकर राजगुरु ने घर छोड़ दिया, तथा कई दिन इधर-उधर घूमते घामते काशी आकर संस्कृत में अध्ययन करने लगे। भोजन और आवास के बदले उन्हें अपने अध्यापक के घरेलू काम करने पड़ते थे। एक दिन उस अध्यापक से भी झगड़ा हो गया और पढ़ाई छोड़कर वे एक प्राथमिक शाला में व्यायाम सिखाने लगे।

यहां उनका परिचय स्वदेश साप्ताहिक, गोरखपुर के सह सम्पादक मुनीश अवस्थी से हुआ। कुछ ही समय में वे क्रांतिकारी दल के विश्वस्त सदस्य बन गये। जब दल की ओर से दिल्ली में एक व्यक्ति को मारने का निश्चय हुआ, तो इस काम में राजगुरु को भी लगाया गया। राजगुरु इसके लिए इतने उतावले थे कि उन्होंने रात के अंधेरे में किसी और व्यक्ति को ही मार दिया।

राजगुरु मस्त स्वभाव के युवक थे। उन्हें सोने का बहुत शौक था। एक बार उन्हें एक अभियान के लिए कानपुर के छात्रावास में १५ दिन रुकना पड़ा। वे १५ दिन उन्होंने रजाई में सोकर ही गुजारे। राजगुरु को यह मलाल था कि भगतसिंह बहुत सुंदर है, जबकि उनका अपना रंग सांवला है। इसलिए वह हर सुंदर वस्तु से प्यार करते थे। यहां तक कि सांडर्स को मारने के बाद जब सब कमरे पर आये, तो राजगुरु ने सांडर्स की सुंदरता की प्रशंसा की।

भगतसिंह से आगे निकलने की होड़ में राजगुरु ने सबसे पहले सांडर्स पर गोली चलाई थी। लाहौर से निकलतेे समय सूटधारी अफसर बने भगतसिंह  के साथ हाथ में बक्सा और सिर पर होलडाल लेकर नौकर के वेष में राजगुरु ही चले थे। इसके बाद वे महाराष्ट्र आ गये। संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने अपने एक कार्यकर्ता के फार्म हाउस पर उनके रहने की व्यवस्था की। जब दिल्ली की असेम्बली में बम फंेकने का निश्चय हुआ, तो राजगुरु ने चंद्रशेखर आजाद से आग्रह किया कि भगतसिंह के साथ उसे भेजा जाए; पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। इससे वे वापस पुणे आ गये।

राजगुरु स्वभाव से कुछ वाचाल थे। पुणे में उन्होंने कई लोगों से सांडर्स वध की चर्चा कर दी। उनके पास कुछ शस्त्र भी थे। क्रांति समर्थक एक सम्पादक की शवयात्रा में उन्होंने उत्साह में आकर कुछ नारे भी लगा दिये। इससे वे गुप्तचरों की निगाह में आ गये। पुणे में उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी को मारने का प्रयास किया; पर दूरी के कारण सफलता नहीं मिली।

इसके अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा सांडर्स वध का मुकदमा चलाकर मृत्यु दंड घोषित किया गया। २३ मार्च, १९३१ को भगतसिंह और सुखदेव के साथ वे भी फांसी पर चढ़ गये। मरते हुए उन्हें यह संतोष रहा कि बलिदान प्रतिस्पर्धा में वे भगतसिंह से पीछे नहीं रहे।